खजुराहो मंदिर (Khajuraho Temple)
खजुराहो मंदिर समूह, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित है और यह भारत की सबसे प्रसिद्ध वास्तुकला धरोहरों में से एक है। यह मंदिर समूह अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला और भव्य मूर्तिकला के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इन मंदिरों को 1986 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया गया था।
निर्माण और इतिहास:
- निर्माण काल: खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईस्वी से 1050 ईस्वी के बीच हुआ था। इन मंदिरों का निर्माण चंदेल राजवंश के शासकों द्वारा किया गया था, जो उस समय बुंदेलखंड क्षेत्र पर शासन करते थे।
- चंदेल शासक: चंदेल राजवंश के प्रमुख राजा जैसे यशोवर्मन और धंगदेव ने इन मंदिरों का निर्माण कराया था। खजुराहो का प्रमुख मंदिर कंदरिया महादेव मंदिर, राजा धंगदेव के शासनकाल में बनाया गया था।
वास्तुकला:
- नागर शैली: खजुराहो के मंदिर नागर शैली की उत्तम उदाहरण हैं, जो भारतीय मंदिर वास्तुकला की एक प्रमुख शैली है। इस शैली की विशेषता मंदिर के शिखर और उसके जटिल रूप में देखी जा सकती है।
- भव्य शिखर: खजुराहो के अधिकांश मंदिरों के शिखर (स्पायर) बहुत ऊँचे होते हैं, जो आकाश की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं। ये शिखर मंदिरों की ऊँचाई को और अधिक भव्य बनाते हैं।
- मूर्ति शिल्प: मंदिरों की बाहरी और आंतरिक दीवारों पर उत्कृष्ट मूर्तिकला का काम किया गया है। इनमें देवताओं, अप्सराओं, मिथकीय कथाओं, और दैनिक जीवन के दृश्यों को दर्शाया गया है। यह मूर्तिकला अद्वितीय शिल्पकला का उदाहरण है।
धार्मिक महत्व:
- खजुराहो के मंदिर मुख्यतः हिंदू और जैन धर्म से संबंधित हैं। यहाँ कुल 85 मंदिर थे, जिनमें से अब केवल 22 मंदिर ही बचे हैं। ये मंदिर हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं जैसे शिव, विष्णु, और देवी शक्ति को समर्पित हैं। जैन धर्म के मंदिर भी इस परिसर का हिस्सा हैं।
प्रमुख मंदिर:
- कंदरिया महादेव मंदिर:
- यह खजुराहो का सबसे बड़ा और भव्य मंदिर है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इसकी ऊँचाई लगभग 30 मीटर है और इसे उत्कृष्ट वास्तुकला और मूर्तिकला के लिए जाना जाता है।
- लक्ष्मण मंदिर:
- यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और खजुराहो के शुरुआती मंदिरों में से एक है। इस मंदिर की मूर्तिकला में धार्मिक, सामाजिक, और मिथकीय कथाओं को दर्शाया गया है।
- चौसठ योगिनी मंदिर:
- यह खजुराहो का सबसे पुराना मंदिर है, जो देवी शक्ति को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण 900 ईस्वी के आसपास हुआ था।
- जावरी और वामन मंदिर:
- ये मंदिर भगवान विष्णु के अवतारों को समर्पित हैं और अपने अद्वितीय शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध हैं।
मूर्तिकला और कामुक चित्रण:
खजुराहो के मंदिर अपनी कामुक मूर्तियों और चित्रण के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। इन मूर्तियों में कामकला, प्रेम और संबंधों के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया है। हालांकि, ये कामुक मूर्तियाँ मंदिर की पूरी सजावट का केवल 10% हिस्सा हैं। ये मूर्तियाँ जीवन के सभी पहलुओं को दर्शाती हैं, जिनमें धार्मिक और आध्यात्मिक दृश्य भी शामिल हैं।
कामुक मूर्तियाँ मुख्यतः मंदिर के बाहरी हिस्से में पाई जाती हैं, जबकि आंतरिक गर्भगृह पूरी तरह से आध्यात्मिकता और पूजा के लिए समर्पित हैं। यह इस विचार को प्रकट करता है कि जीवन के सभी पहलुओं का समन्वय आवश्यक है और आत्मज्ञान के मार्ग पर चलने से पहले सांसारिक जीवन को पूर्ण रूप से समझना चाहिए।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व:
खजुराहो के मंदिर भारतीय संस्कृति, धर्म और कला के अद्वितीय मिश्रण का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहाँ का वास्तुशिल्प और मूर्तिकला कला भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का प्रमाण है।
इन मंदिरों के निर्माण के पीछे का उद्देश्य केवल धार्मिक नहीं था, बल्कि यह कला और संस्कृति का प्रसार भी था। मंदिरों की मूर्तियाँ उस समय की जीवनशैली, परंपराओं, और मान्यताओं का अद्वितीय चित्रण करती हैं।
संरक्षण और महत्व:
खजुराहो के मंदिरों का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किया जा रहा है। यूनेस्को द्वारा इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता मिलने के बाद, यहाँ के मंदिरों की देखरेख और संरक्षण में और भी तेजी आई है।
आज खजुराहो एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, जहाँ हर साल हजारों पर्यटक आते हैं। यह स्थल भारतीय इतिहास, धर्म और वास्तुकला के विद्यार्थियों के लिए भी महत्वपूर्ण अध्ययन का केंद्र है।
खजुराहो के मंदिरों से जुड़े कई रोचक तथ्य हैं जो न केवल इनके वास्तुशिल्प और धार्मिक महत्व को दर्शाते हैं, बल्कि इनके इतिहास और निर्माण प्रक्रिया को भी विशेष बनाते हैं। यहाँ कुछ ऐसे रोचक तथ्य दिए गए हैं:
1. निर्माण के पीछे का रहस्य:
- खजुराहो के मंदिरों का निर्माण एक ऐसे समय में हुआ जब चंदेल वंश का शासन चरम पर था। इन मंदिरों के निर्माण में लगभग 100 वर्षों का समय लगा था। इसके बावजूद, यह आज भी स्पष्ट नहीं है कि इतने विशाल और जटिल मंदिरों का निर्माण कैसे किया गया था। माना जाता है कि उस समय के शिल्पकारों ने विशेष रूप से प्रशिक्षित कारीगरों और विशेषज्ञों की सहायता से इन मंदिरों को बनाया था।
2. केंद्रीय भारत के सुदूर इलाके में स्थित:
- खजुराहो का मंदिर समूह मध्य प्रदेश के सुदूर क्षेत्र में स्थित है, जो भारत के मुख्य धार्मिक केंद्रों से दूर था। इसके बावजूद, ये मंदिर पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गए और उन्हें यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता मिली। यह दर्शाता है कि ये मंदिर केवल धार्मिक केंद्र नहीं थे, बल्कि कला और वास्तुकला का महत्वपूर्ण केंद्र भी थे।
3. मंदिरों के नामकरण का रहस्य:
- खजुराहो का नाम "खजूर" से लिया गया है, जिसका अर्थ "खजूर का पेड़" है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में कभी बहुत सारे खजूर के पेड़ होते थे, जिसके कारण इसका नाम "खजुराहो" पड़ा।
4. मूर्तिकला की विविधता:
- खजुराहो के मंदिरों में पाई जाने वाली मूर्तियाँ केवल कामुक दृश्य ही नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न पहलुओं को भी दर्शाती हैं। मंदिरों में धार्मिक अनुष्ठान, नृत्य, संगीत, युद्ध, और दैनिक जीवन के दृश्य भी उकेरे गए हैं। यह मूर्तियाँ उस समय की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करती हैं।
5. 85 में से 22 मंदिर ही बचे:
- खजुराहो में पहले लगभग 85 मंदिर थे, लेकिन समय के साथ और प्राकृतिक आपदाओं के कारण अब केवल 22 मंदिर ही बचे हैं। इन बचे हुए मंदिरों को यूनेस्को द्वारा संरक्षित किया गया है और ये आज भी खजुराहो की गौरवशाली विरासत का हिस्सा हैं।
6. मुगल काल में खजुराहो का पतन:
- मुगल काल के दौरान, खजुराहो के मंदिरों को काफी हद तक उपेक्षित कर दिया गया था। मुगल शासकों की धार्मिक नीतियों के कारण, इन मंदिरों का संरक्षण नहीं किया गया। यह भी माना जाता है कि मुगलों द्वारा कुछ मंदिरों को आंशिक रूप से नष्ट कर दिया गया था।
7. खजुराहो की पुनर्खोज:
- खजुराहो के मंदिरों की पुनर्खोज 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश इंजीनियर टी.एस. बर्ट द्वारा की गई थी। उस समय ये मंदिर घने जंगलों के बीच छिपे हुए थे और इन्हें कई सदियों तक भूला दिया गया था। टी.एस. बर्ट ने इन मंदिरों की भव्यता और अद्वितीय वास्तुकला को देखकर इसे फिर से दुनिया के सामने लाया।
8. खजुराहो नृत्य महोत्सव:
- खजुराहो में हर साल फरवरी या मार्च के महीने में खजुराहो नृत्य महोत्सव का आयोजन होता है। यह महोत्सव भारत के शास्त्रीय नृत्यों जैसे कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी, और मोहिनीअट्टम को समर्पित होता है। खजुराहो के भव्य मंदिरों की पृष्ठभूमि में इन नृत्यों का प्रदर्शन किया जाता है, जो इस स्थल की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाता है।
9. खजुराहो और वास्तुकला की गणितीय उत्कृष्टता:
- खजुराहो के मंदिरों की संरचना और डिजाइन में अद्भुत गणितीय और ज्यामितीय सटीकता देखी जा सकती है। इन मंदिरों के निर्माण में न केवल धार्मिक विचारधारा का समावेश था, बल्कि विज्ञान और गणित का भी विशेष ध्यान रखा गया। मंदिरों का आयाम, उनकी ऊँचाई और उनके शिखर का गणितीय अनुपात अद्वितीय है।
10. तीन मुख्य समूह:
- खजुराहो के मंदिरों को तीन प्रमुख समूहों में विभाजित किया गया है: पश्चिमी समूह, पूर्वी समूह, और दक्षिणी समूह। पश्चिमी समूह सबसे प्रमुख है, जिसमें कंदरिया महादेव और लक्ष्मण मंदिर जैसे बड़े और भव्य मंदिर शामिल हैं। ये मंदिर एक विशाल परिसर में फैले हुए हैं और हर समूह की अपनी विशिष्ट पहचान है।
11. मिट्टी और पत्थरों का उपयोग:
- खजुराहो के मंदिरों के निर्माण में बालू पत्थर का उपयोग किया गया है। पत्थरों को एक-दूसरे के साथ जोड़ने के लिए सीमेंट या गारा का इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि पत्थरों को आपस में इस तरह से फिट किया गया कि वे स्थिर बने रहें। यह तकनीक खजुराहो के शिल्पकारों की अद्भुत कुशलता को दर्शाती है।
खजुराहो के मंदिर भारतीय स्थापत्य कला के अद्वितीय उदाहरण हैं, और इनसे जुड़े ये रोचक तथ्य इसे और भी महत्वपूर्ण और रहस्यमय बनाते हैं। ये मंदिर भारत की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं और पूरी दुनिया में अपनी भव्यता और कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध हैं।
खजुराहो का इतिहास:
चंदेल राजवंश का उदय:
- खजुराहो का निर्माण मुख्य रूप से चंदेल राजाओं द्वारा 950 से 1050 ईस्वी के बीच करवाया गया था। चंदेल वंश का उदय 9वीं शताब्दी में हुआ, और उन्होंने बुंदेलखंड क्षेत्र में अपनी सत्ता स्थापित की। चंदेल राजवंश के प्रमुख राजा जैसे यशोवर्मन (925-950 ईस्वी) और धंगदेव (950-1002 ईस्वी) के शासनकाल के दौरान खजुराहो के प्रमुख मंदिरों का निर्माण हुआ।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र:
- खजुराहो का मंदिर समूह उस समय धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र था। चंदेल शासक हिंदू और जैन धर्म के अनुयायी थे और उन्होंने दोनों धर्मों के मंदिरों का निर्माण करवाया। खजुराहो के मंदिर न केवल धार्मिक स्थलों के रूप में काम करते थे, बल्कि वे कला, संगीत, नृत्य, और शिल्पकला के महत्वपूर्ण केंद्र भी थे।
मुगल आक्रमण और उपेक्षा:
- 13वीं शताब्दी में, दिल्ली सल्तनत और मुगल आक्रमणों के कारण खजुराहो के मंदिर उपेक्षित हो गए। मुगल शासकों के आने के बाद, इस क्षेत्र का महत्व धीरे-धीरे कम हो गया और मंदिर घने जंगलों में छिप गए। मंदिरों की स्थिति और धार्मिक गतिविधियों में कमी आई, जिसके कारण ये मंदिर लगभग भूला दिए गए थे। यूनेस्को की मान्यता:
- 1986 में, खजुराहो के मंदिरों को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया गया। इसके बाद से ये मंदिर भारतीय और वैश्विक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन गए और इनका संरक्षण और देखभाल बढ़ी।
खजुराहो का महत्व:
- वास्तुकला की उत्कृष्टता:
- खजुराहो के मंदिर नागर शैली की भारतीय मंदिर वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन मंदिरों की डिज़ाइन, शिखर, और मूर्तिकला अद्वितीय हैं और भारतीय वास्तुकला की महानता को दर्शाते हैं। यहाँ के मंदिरों की नक्काशी और मूर्तियाँ विश्वस्तरीय शिल्पकला की पहचान मानी जाती हैं।
- धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र:
- खजुराहो का मंदिर समूह न केवल धार्मिक स्थल है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, संगीत, नृत्य, और कला का केंद्र भी रहा है। यहाँ के मंदिरों में देवी-देवताओं के साथ-साथ नृत्य, संगीत, और प्रेम के दृश्यों को भी उकेरा गया है, जो इस स्थल की सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है।
- समाज का दर्पण:
- खजुराहो के मंदिरों में की गई मूर्तिकला समाज के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती है, जिसमें धार्मिक अनुष्ठान, दैनिक जीवन, और सामाजिक परंपराएँ शामिल हैं। यहाँ की कामुक मूर्तियाँ केवल कामुकता का चित्रण नहीं करतीं, बल्कि यह दर्शाती हैं कि भारतीय समाज में जीवन के सभी पहलुओं का सम्मान किया जाता था।
- भारत की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा:
- खजुराहो का मंदिर समूह भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह स्थल न केवल भारतीय पर्यटकों को आकर्षित करता है, बल्कि विश्वभर के कला प्रेमी और इतिहासकार भी यहाँ की वास्तुकला और मूर्तिकला का अध्ययन करने आते हैं।
- शिल्पकला और गणितीय श्रेष्ठता:
- खजुराहो के मंदिरों की शिल्पकला और निर्माण में गणितीय और ज्यामितीय सटीकता का समावेश है। मंदिरों का निर्माण पत्थरों को इस प्रकार से जोड़कर किया गया है कि उन्हें किसी अतिरिक्त सीमेंट या गारे की आवश्यकता नहीं होती। यह इस बात का प्रमाण है कि उस समय के शिल्पकार और वास्तुकार कितने कुशल और बुद्धिमान थे।
निष्कर्ष:
खजुराहो का मंदिर समूह भारतीय कला, संस्कृति, और धर्म का अनूठा संगम है। यह स्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारतीय स्थापत्य कला और मूर्तिकला का विश्वस्तरीय उदाहरण भी है। खजुराहो का इतिहास चंदेल वंश की शक्ति और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रमाण है, और इसका महत्व आज भी भारतीय और वैश्विक स्तर पर बना हुआ है।
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